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Radha Soami Path Philosophy : अनहद नाद (Anahad Naad) का अर्थ और महत्व

 राधास्वामी दर्शन में, "नाम" या "शब्द" का जिक्र हम बार बार सुनते है। जैसा की बाबाजी ने पिछले सर्व धर्म सम्मलेन में जो सम्माननीय नामधारी संस्था द्वारा कराया गया था ; में कहा की 
"ज्ञान ध्यान धुन जानिये अकथ कहावे सोये। "
अर्थात शब्द या नाम कोई कही जा सकने वाली भाषा नहीं है , यह तो अकथ है जो ज्ञान और ध्यान द्वारा समझी जाती है। इसे दिव्य माना जाता है जो आत्मा को उस परमात्मा  से जोड़ता है । इन अवधारणाओं  निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :
Radha Soami Philosophy



नाम , शब्द या अनहद नाद :

नाम सचखंड या परमात्मा की दरगाह से निकलने वाली दिव्य ध्वनि है। ये रचनात्मक शक्ति है जो सभी अस्तित्व को बनाए रखती है और नियंत्रित करती है। नाम शरीर के अंदर ही होता है जो आँखों से ऊपर के हिस्से या आज्ञा चक्र पर ध्यान केंद्रित करके ; जो गुरु मंत्र द्वारा पहचाना जाता है। इसे अनाहद नाद या शब्द धुन के नाम से भी जाना जाता है। 
राधा स्वामी मत पूर्णतया संतो या निर्गुणी संतो की विचारधारा पर आधारित है जिनमे कबीर दास जी , गुरु नानक देव जी , सूफी संत और हाथरस के तुलसी साहिब की विचारधारा या दर्शन प्रमुख है।

आध्यात्मिक अभ्यास:

राधास्वामी पंथ के साधक सुरत शब्द योग का अभ्यास करते हैं, जो नाम या शब्द या अनहद नाद पर ध्यान और आंतरिक एकाग्रता पर केंद्रित है।
इसमें प्रथम सुमिरन जो गुरु बताते है , फिर ध्यान और तीसरा चरण शब्द धुन या अनाहद नाद सुनने का है जो व्यक्ति को उस परमात्मा से जोड़कर उसे मुक्ति प्रदान करती है। 
आइये समझते है की ये प्रक्रिया किस प्रकार होती है :

सुमिरन और ध्यान :

हम अपनी सारी  जिंदगी किसी न किसी चीज का सिमरन करते रहते है। जिस चीज का हम सिमरन करते है , उसी चीज का ध्यान हमारी आँखों में आना शुरू हो जाता है। औरत का सुमिरन करते है , हमारी प्रेमिका या बीवी हमारे आँखों के आगे आ जाती है , धन दौलत का सुमिरन करते है , कोई लेनदार या देनदार हमारी आँखों के आगे आना शरू हो जाता है।  इसी प्रकार अगर हम उस परमात्मा का सिमरन करते है तो परमात्मा भी आँखों के आगे आएगा जैसे वाणी में हम पढ़ते है 
"जैसा ध्यावै तैसा होइए। "
जिस चीज का हम ध्यान करते है या सुमिरन करते है , हमारी जिंदगी में वैसा ही होने लगता है। 
अब सवाल पैदा होता है की परमात्मा को हमने कभी देखा नहीं और किसी चीज का हम ध्यान क्यों करे क्योंकि अगर मूर्ति का ध्यान करे तो वो तो मिटटी है , सिर्फ एक तत्व और जो सब चीजे गाय वगरह है वे 4 तत्व की है। 
हम मनुष्य जो 5 तत्व के है ; निचे की चीजों का ध्यान क्यों करे ,रही बात देवी देवताओं की तो वे भी इंसान से निचे की शक्ति ही है , चाहे वे कोई भी देवी देवता हो।  जैसा की हम कुण्लिनी चक्र योग में भी देखते है की देवी देवता आज्ञा चक्र से निचे निचे ही रह जाते है।  
अब बात आती है की इंसान ध्यान किसका धरे ?  तो गुरु नानक देव जी कहते की गुरु का। अब मन में सवाल पैदा होता है की गुरु भी तो इंसान ही है , उसका क्यों।  तो वाणी मे लिखा है -
" ज्यों जल तरंग उठे बहुभाति , फिर सळले सळल समायेंदा। "
अर्थात जैसे समुद्र में 2 4 मिनट के लिए कोई लहार उठती है , लहर वापस जाकर फिर समुद्र में समा जाती है। उसी प्रकार संत महात्मा भी उस सचखंड से उठी हुई लहरे होते है , जो कुछ समय बाद उस सचखंड में मिल जाते हैं और हमें भी उस सचखंड में अपने साथ ले जाते है। 
जैसा कबीर दास जी कहते है -
"गुरु गोविन्द दोउ खड़े का के लागूं पाये।"
जैसे स्वामी जी महाराज कहते है -
"गुरु का ध्यान कर प्यारे , बिना इसके नहीं छूटना। "
अब प्रश्न उठता है की गुरु तो संसार में बहुत है तो जीवत गुरु जिसका हमें ध्यान करना है ; पहचाने कैसे ? तो कबीर दास जी कहते है 
"गुरु गुरु में भेद है , गुरु गुरु में भाव। 
सोइ गुरु नित वन्दिये , जो शब्द बतावे दाव। " 
अर्थात गुरु गुरु में अंतर है , हमें शब्द भेदी या अनहद नाद अभ्यासी गुरु की खोज करनी चाहिए ।

भजन या अनहद नाद :

ध्यान के पश्चात एक गुप्त विधि है , जिसमे अनहद नाद या शब्द धुन सुनने की विधि बताई जाती है। अनहद धुन सचखंड से उतरकर भंवरगुफा, भँवरगुफा से महासुन्न तथा सुन्न मंडल से उतरकर दशम द्वार , दशम द्वार से त्रिकुटी होते हुए बंकनाल के माध्यम से सहस्रार चक्र में पहुँचती है , जहां कुंडलिनी चक्र योग समाप्त हो जाता है तथा शब्द योग शुरू होता है। 
इसलिए शब्द अभ्यासी गुरु से शिक्षा ग्रहण कर घर बैठे अपने मालिक को याद करना चाहिए जैसा की कहा जाता है -
"घर में घर दिखाय दे , सो सतगुर पुरख सुजान। "

शब्द में सिर्फ ध्वनि ही नहीं अपितु प्रकाश भी है , जिसका पीछा करते हुए व्यक्ति अपने घर या सचखंड पहुँच सकता है। क्योंकि अगर हम रात के समय अपने घर से भटक जाते है और रास्ता समझ नहीं आता तो हम देखते है की रौशनी किस तरफ से आ रही है और आवाज किस तरफ से आ रही है। 
सहस्रार चक्र तक पहुंचे हुए अभ्यासी प्रलय में तथा त्रिकुटी तक पहुंचे हुए अभ्यासी महाप्रलय में इस धरती  पर वापिस आते है किन्तु भँवरगुफा पहुँचने के पश्चात कोई देह बंधन में दोबारा नहीं आता किन्तु वह मालिक से नहीं मिल सकता जब तक वहां से गुजरते समय कोई पूर्ण संत उन्हें अपने साथ न ले जाए। 

उद्देश्य:

नाम को भौतिक, मानसिक और सूक्ष्म स्तरों से ऊपर उठने का साधन माना जाता है, जो आत्मा को परमात्मा के साथ फिर से जुड़ने में मदद करता है।
यह मार्गदर्शक शक्ति है जो अहंकार, आसक्ति और सांसारिक इच्छाओं को समाप्त  करती है।

अनुभव:

गुरमुखों  को ध्यान के दौरान आंतरिक रूप से ध्यान केंद्रित करना सिखाया जाता है, जहाँ वे दिव्य ध्वनियों और आंतरिक प्रकाश का अनुभव कर सकते हैं, जिन्हें नाम की अभिव्यक्ति माना जाता है।

डेरा बाबा जैमल सिंह किन भाषाओं में अपने प्रवचन देता है  :

राधा स्वामी सत्संग ब्यास हिंदी, पंजाबी, उर्दू और क्षेत्रीय बोलियों सहित कई भाषाओं में प्रवचन देता  हैं।

निष्कर्ष:

राधा स्वामी दर्शन में, नाम या शब्द केवल एक अवधारणा नहीं है, बल्कि एक जीवित आध्यात्मिक शक्ति है। यह ईश्वर का सार है, जो ध्यान और गुरु के मार्गदर्शन के माध्यम से प्राप्त होता है। नाम से जुड़कर, आत्मा परम सत्ता के साथ परम एकता की ओर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ती है।
















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